सपने थे सारे जो देखा करती थी
अपनी आँखों को बंद कर घंटों कुछ कुछ सोचती रहती थी
जब जब आंख खुलती थी सपना टूटता और मैं डर सी जाती थी
फिर उठके खुद को प्यार से समझाती, तो क्या हुआ सपना ही तो था जो टूट गया
फिर नए सपने देखने की तलाश में गहरी नींद में चली जाती थी
हर सपना मेरा कुछ कुछ नींद चुरा लेता था मेरी
आलम ऐसा हुआ की आंखें नींद से और नींद सपनो से कतराने लगी
अब मिल जाते हैं जब कभी मुझसे मेरे सपने
मुह फेर के निकल जाते हैं जैसे मुझे कभी जाना ही नही
अजनबी हुए मुझसे मेरे सपने, अब मुझे पहचानते नही
हू क्या मैं उन सपनों की लहरों के बिना
जो मुझे कभी भी कहीं भी बहा ले जाती थी
तैरना आता तो दुख ना होता
पर अब इन लहरों के बिना बस डूबती ही जाती हूँ
अपनी आँखों को बंद कर घंटों कुछ कुछ सोचती रहती थी
जब जब आंख खुलती थी सपना टूटता और मैं डर सी जाती थी
फिर उठके खुद को प्यार से समझाती, तो क्या हुआ सपना ही तो था जो टूट गया
फिर नए सपने देखने की तलाश में गहरी नींद में चली जाती थी
हर सपना मेरा कुछ कुछ नींद चुरा लेता था मेरी
आलम ऐसा हुआ की आंखें नींद से और नींद सपनो से कतराने लगी
अब मिल जाते हैं जब कभी मुझसे मेरे सपने
मुह फेर के निकल जाते हैं जैसे मुझे कभी जाना ही नही
अजनबी हुए मुझसे मेरे सपने, अब मुझे पहचानते नही
हू क्या मैं उन सपनों की लहरों के बिना
जो मुझे कभी भी कहीं भी बहा ले जाती थी
तैरना आता तो दुख ना होता
पर अब इन लहरों के बिना बस डूबती ही जाती हूँ